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आवाजों वाला घर

जी हाँ
मैं घर बनाता हूँ
लोह लक्कड़
ईंट पत्थर
काठ कंकड़ से खड़ा कर
द्वार पर पहरा बिठाता हूँ

जी हाँ
मैं घर बनाता हूँ
एक दिन
मेरे भीतर का मैं
बाहर आया
चारो ओर घूमकर
चिकनी दीवारों पर
बार बार हाथ फेरकर
खिड्किओं और दरवाजों को
कई कई बार
खोलकर -बंदकर
संतुष्टि करता हुआ बोला :
क्या ख़ाक घर बनाते हो
मैं बताता हूँ तुम्हे
घर बनाना
घर बनता है
घर के भीतर की आवाजों से :
चढ़ती उतरती सीडिओं पर
घस-घस
बर्तनों की टकराहट
टपकते नल की टप टप
द्वार पर किसी की आहट
रसोई से कुकर की सीटी
स्नानघर से हरी ॐ तत्सत
पूजाघर से -टनन टनन
आरती के स्वर
आँगन से बच्चों की धकापेल
दादा की टोका टाकी
ऊपरी मन से
दादी की कोसा काटी
और इसी बीच

महाराजिन का पूछना
"बीबी जी क्या बनाऊं ?
जब तक यह सब कुछ नहीं
तब तक घर घर नहीं
मत कहना दोबारा
कि मैं


जब १९७४ में रेल हड़ताल हुई तो मैं रेलवे मैन्स यूनियन गाजियाबाद ब्रांच का पदाधिकारी था। रेलवे कर्मचारियों की इस यूनियन की बागडोर फैडरेशन लेबल पर श्री जार्ज फर्नांडीज के हांथों में थी। गाजियाबाद ही नहीं सारे भारत में यंहा तक की मुंबई में भी जहा कभी भी इससे पहले की हडतालों में रेल बंद हुईं हैं, वंहा के प्लेटफार्म पर भी सूनापन पसरा था। गाड़ियाँ जंहा की तंहा खड़ी थीं।
देश में कोंग्रेस का राज था। हर जगह नारे लग रहे थे- "तानाशाही नहीं चलेगी, गुंडागर्दी नहीं चलेगी, हमारी मांगें पूरी करो" आदि-आदि। रेलवे की यह हड़ताल पूरी तरह सफल रही, सिवाय इसके की कुछ स्थानों पर सिर-फिरे पुलिस कर्मियों की ज्यादती रही। हर जिले की जेलें हडताली कर्मचारियों से पात दी गयीं, लेकिन यह सुनने को नहीं मिला कि किसी कर्मचारी का सिर पुलिस की लाठी से फूट गया या कर्मचारियों को दोड़ा-दोड़ा कर पिता गया। मैं चूँकि स्वयं भुक्तयोगी रहा हूँ, इसलिए इसका साक्षी भी हूँ। जेल में जेल अधिकारीयों का व्यवहार अच्छा और सोहार्दपूर्ण था।
लेकिन आज का नजारा दूसरा है, ३६ साल में देश ने बहुत तरक्की की है। पुलिस और नेताओं के दिमाग विकसित हुए हैं, उनकी सोच बदली है। अब वे हडताली कर्मचारियों को आदमियों के झुण्ड में न देख कर पशुओं के झुण्ड में देखते है उन्हें लगता है की साड़ी भेड़ें एक हो गयी हैं और ये बिना लाठी के काबू में नहीं आयेंगी। साथ ही लाठी चलाने वाले और चलवाने वाले अफसर राज्य -सर्कार में अपने नंबर बदवाना चाहतें हैं। अब नंबर तो इसी तरह से बढेंगे न कि वे सरकार कि मर्जी के मुताबिक़ कार्य करें। अपना विवेक और अपनी मानवता घर के भीतर खूंटी पर टांग कर कार्य करें।
दिनांक २२/१/२०१० को आप लगभग सभी चैनेलों पर देख रहे होंगें कि किस प्रकार उत्तर प्रदेश कि राजधानी लखनऊ का डी.एम. एक कर्मचारी को चांटा मार रहा है। और चांटे से पहले चेतावनी देना भी नहीं भूलता कि उसे गुस्सा न दिलाया जाय। अब डी.एम. के एक चांटे ने उस कर्मचारी की सामाजिक इज्जत और उसके स्वाभिमान पर एक प्रश्न चिन्ह लगा दिया। यदि डी.एम.के स्थान पर कोई उसका हमजोली होता तो उसका भी हाथ उठ सकता था, लेकिन यंहा उस कर्मचारी का विवेक काम कर रहा था की प्रत्युतर का परिदाम होगा शरीर की एक भी हड्डी का साबुत न बचना।

प्रश्न चांटे या लाठी चार्ज पर ही समाप्त नहीं होता। यदि सरकार तंत्र ने येनकेन-प्रकारेण इस स्थानीय साधारण से विद्रोह को कुचल भी दिया और विजय प्राप्त कर ली तो क्या समस्या का हल हो गया? मैं समझता हूँ इससे कर्मचारियों के मन में जो विद्रोह का विस्फोट होगा वह लाठी और चांटे से अधिक भयंकर होगा। साधारण स्थिति में भी जंहा दफ्तर का बड़ा बाबु अपनी सीट पर अपना चश्मा रख कर गायब हो जाता है, और लोग इन्तजार में ऐसे बैठे रहते है, जैसे वे किसी चिता के पास बैठकर कपाल खोपड़ी की क्रिया पूर्ण होने का इन्तजार कर रहे हों. चुपचाप बिलकुल शांत लोहे या फट्टे की बेंच पर रह -रहकर पास बदलते हुए । तो इस लाठी -चांटे का बदला कर्मचारी अपनी अनुपस्थिति का समय बढाकर, सही को सही कहने की अपनी सुविधा शुल्क बढाकर सरकार से बदला लेने की कोशिश करेगा। और इसके बाद कर्मचारी किसी भी हड़ताल या विद्रोह जताने से पहले दस बार सोचेंगे। शायद धीरे-धीरे वे किसी भी प्रकार के विदोढ़ से ही विमुख हो जायें। और महसूस करने लगे कि प्रजातंत्र और लोकतंत्र केवल दिखावा है। जंहा व्यक्ति अपना विरोध प्रकट नहीं कर सकता वंहा कैसा लोकतंत्र।


-बी.एल. गौड़
श्री बाला साहिब ठाकरे के akhbaar का नाम है सामना, जिसके वे सवेसवाZ हैं। मुख्य-संपादक, संपादक, मालिक, प्रकाशक यानि की सब कुछ। इसके चलते उन्हें पूरा अधिकार है कि वे इसमें कुछ भी लिख सकते हैं, छाप सकते हैं, वितरित कर सकते हैं-जिसे मुम्बइZ के नागरिक पढ़ते हैं। अगर नहीं पढ़ते तो पढ़वाये जाते हैं।मुम्बइZ निवासियों को पता है कि सामना का आमना करने के लिए किसी में भी ताकत नहीं है। ठाकरे जी के सामने बड़ी हस्तियाँ तो क्या सरकारें भी नतमस्तक रहती हैं। यदि इतिहास पलट कर देखें तो बाला साहिब ने जैसी भी चाही टिप्पणी की, सरकार के विरुद्ध कोइZ भी ब्यान दिया या उनके कायZकताZओं ने कुछ भी किया, चाहे वह रेलवे बोडZ की परीक्षा के केन्द्र का तहस-नहस करना हो या मुम्बइZ से बाहर के अभ्याथिZयों की पिटाइZ या इसी तरह की अन्य गतिविधियाँ। लेकिन कोइZ भी सरकार उनके सामने का आमना नहीं कर पाइZ। एक तरह से कहा जाये तो वे इस क्षेत्र में अजेय बने रहे। और ऐसा होता है, ऐसा ही कुछ जब भी हुआ था जब लालू जी बिहार के मुख्यमंत्राी थे। किसी भी कार के शोरूम को तोड़कर जबरन गाड़ियाँ निकलवा सकते थे और शराफत के तकाजे के तहत इस्तेमाल करने के बाद उन्हें वापस शोरूम के दरवाजे पर छुड़वा सकते थे।अब बाला साहिब ने सामना में लिखकर देश के महानतम् क्रकिेटर को नसीहत के साथ-साथ धमका भी दिया कि ख्+ाबरदार अगर तुमने अपने आपको भारत का नागरिक बताया। पहले कहो कि मैं महाराष्ट्रीयन हूँ और केवल मुम्बइZ का हूँ। हाँ अगर पूछताछ में कोइZ परेशान करने लगे जैसा कि विदेशों में एयरपोटZ पर होता है, वे लोग बार-बार पूछते रहते हैं कन्ट्री? कन्ट्री? आप जब तक कन्ट्री नहीं बतायेंगे तब तक वे आपको न तो अपने देश में घुसने देंगे और न ही अपने देश के एयरपोटZ से उड़ान भरने देंगे। शायद वे बेवकूफी करते हैं, उनका काम चल जाना चाहिए केवल यह कह देने से कि मैं महाराष्ट्रीयन हूँ, बिहारी हूँ, कशमीरी हूँ, हिमाचली हूँ लेकिन नहीं, कहना ही पड़ता है कि मैं भारतीय हूँ।कितनी विवशता बन आती है भारतीय कहने के लिए। बस प्रयि सचिन की यही बात तो बाला साहिब को नागवार गुजरी। उन्हें हरगिज हरगिज नहीं कहना चाहिए था कि मुम्बइZ सब की है, कहना चाहिए था कि मैं सचिन तैंदुलकर, बाला साहिब ठाकरे जी की मुम्बइZ का निवासी हूँ, उनकी रियाया हूँ और भारतीय तो मैं बहुत बाद में हूँ।अब क्या हो? कौन करेगा सामना का आमना? जहाँ पुलिस, प्रशासन, सरकारें फेल हैं, वहाँ बस एक ही तंत्र बचता है और वह है प्रजा का तंत्र। जिसने अपने जलवे की झलक बाला साहिब को विधान सभा में दिखा भी दी है। मराठी मानुष का गढ़ कहे जाने वाले क्षेत्र में भी बाला साहिब के प्रत्याशी को हार का मुँह देखना पड़ा। बस यही एक तंत्र बचा है, जो बाला साहिब ठाकरे के डर से मुम्बइZ और महाराष्ट्र के निवासियों को निजात दिला सकता है। यदि उनके मन में यह बात, यह विचार बैठ जाये कि वे सब पहले तो भारतवासी हैं, भारत माता के लाल हैं और तत्पश्चात् महाराष्ट्रीयन हैं तो सम्भव है कि वे एक डर के साये से बाहर आकर चैन की साँस ले सकें।याद दिला दे कि वीर सावरकर जैसे वीर महाराष्ट्रीयन जरूर थे पर उन्होंने कालापानी की जेलों में कोल्हू में जुतकर जो तेल निकाला था, वह केवल मुम्बइZ को आजाद कराने के लिये नहीं था बल्कि समस्त भारत का स्वतंत्र कराने के लिए था। यदि उन्होंने यह सब केवल मुम्बइZ के लिये ही किया होता तो हर भारतवासी का सिर श्रद्धा से उनके लिये नहीं झुकता।बाला साहिब जी! जरा सोचिये और कृपा कीजिए हम सब देशवासियों पर। हम सब भारतीयों को मुम्बइZ बहुत प्यारी है, महाराष्ट्र बहुत प्यारा है, आप बहुत प्यारे हैं बशते± की आप केवल क्षेत्रवाद का अलाप छोड़ दें, और अपना दृष्टिकोण बड़ा कर लें। हम आपके शतायू होने की कामना रखते हैं।

हमराही

मेरी कलम से ....