जाने ऐसा क्यों लगता है
सूरज अब धीरे चलता है
संध्या के पंजों से घायल
कुछ कुछ लंगडा कर चलता है

कनक रंग से रंगी चूनरी
अपने हाथ उढ़ा धरती को
फिर धीरे से गोता खाकर
चल देता अनजान नगर को
हम ही जानें जाने कैसे
तिल तिल करके तम गलता है

गई रात तक हम गिनते हैं
दिन के छूटे काम अधूरे
सपनों में भी ताना बुनते
कल सब कैसे होंगे पूरे
हम चिंता में यह मस्ती में
यही आचरण तो खलता है

टूटे फूटे स्वप्नों के संग
तंद्रा - निद्रा के बंधन में
ओढ़ चदरिया सोते जगते
लेकर कई प्रशन उलझन में
इसकी फिर से वही कहानी
राह पुरानी पर चलता है

तरक्की

आदमी बहुत तरक्की कर गया है
संवेदनहीनता की
सारी हदें पार कर गया है

अब
आदमी का मरना ,या
सरेआम मार दिया जाना
महज एक सनसनीखेज़ ख़बर के अलावा
और कुछ नहीं होता
और इस ख़बर की उमर भी
बुलबुले की उमर के बराबर होती है
वास्तविकता तो ये है
की अब
आदमी दो भागों में विभक्त हो गया है
बाहर से पहले जैसा ज़िंदा
लेकिन
भीतर से मर गया है

आदमी को इंसान बनाने के लिए
जरूरी है एक आसव
जिसे तैआर करने के लिए
जरूरी हैं कुछ जड़ी बूटियाँ
जैसे
गीत ,कविता ,कहानी
दोहा,मुक्तक और ग़ज़ल
सबको बराबर मात्रा में लेकर
मिलाकर उतना hi दर्देजल
घूँट -घूँट कर पीना होगा
तभी बच पायेगा
आदमी का आदमीपन
और इसके लगातार सेवन से
आप देखेंगे
क़ि बदल गया है आदमी
और वह अब
आदमी से इंसान बन गया है

मत पूछो प्रशन कोई हमसे
उत्तर से और जनम लेंगे
अंतस में जो बचे शेष वे
आंसू बनकर छलकेंगे

जाने कितनी मन्नत मानीं
दर कितनों पर कर जोर झुके
गर मिला कहीं भी देवस्थल
तो पाँव वहाँ पर स्वयं रुके
तब किसी पुजारी ने आकर
इक बात कही यों समझाकर
करम लिखे जो मांथे पर वे
नहीं तिलक से बदलेंगे

हम रहे खोजते प्रेम डगर
ना जाने कहाँ विलीन हुई
घर भीतर खोया अपनापन
मानवता बन कर उड़ी रुई
बढ़ती हुई भीड़ में शायद
खोया कहीं आदमीपन
कितनी भी कसो मुट्ठ्याँ तुम
रजकण बाहर ही निकलेंगे

बी एल गौड़

तू मुझे भी साथ ले चल

तू मुझे भी साथ ले चल
झूमकर बहते पवन
है मुझे चूना उसे जो
जा बसा नीले गगन

देकर दिलाशा वह गया
मैं लौटकर फिर आऊँगा
ताप हर लेगा तुम्हरा
पुष्प जो मैं लाऊँगा
टाक नित सूनी डगर को
थक चुके हैं अब नयन

गर न पाया वह गगन तो
पार सागर के चलेंगे
तीव्र गति का यान लेकर
पार हर दूरी करेंगे
वह कहीं भी तो मिलेगा
घाट-घाटी या घने वन
ये न जाने कौन मन की
प्यास को देता बढ़ावा
और इस ढलती उमर में
फूटता सुधिओं लावा
कौन कब आया कहाँ पर
पहन कर पीले वसन

पा न पाये हम उसे तो
खा रहे गंगा कसम
मान कर यह झूंठ था सब
तोड़ लेंगे हम भरम
सोच कर मित्थ्या जगत ये
हम करेंगे वन गमन
बी एल गौड़

आवाजों वाला घर

जी हाँ
मैं घर बनाता हूँ
लोह लक्कड़
ईंट पत्थर
काठ कंकड़ से खड़ा कर
द्वार पर पहरा बिठाता हूँ

जी हाँ
मैं घर बनाता हूँ
एक दिन
मेरे भीतर का मैं
बाहर आया
चारो ओर घूमकर
चिकनी दीवारों पर
बार बार हाथ फेरकर
खिड्किओं और दरवाजों को
कई कई बार
खोलकर -बंदकर
संतुष्टि करता हुआ बोला :
क्या ख़ाक घर बनाते हो
मैं बताता हूँ तुम्हे
घर बनाना
घर बनता है
घर के भीतर की आवाजों से :
चढ़ती उतरती सीडिओं पर
घस-घस
बर्तनों की टकराहट
टपकते नल की टप टप
द्वार पर किसी की आहट
रसोई से कुकर की सीटी
स्नानघर से हरी ॐ तत्सत
पूजाघर से -टनन टनन
आरती के स्वर
आँगन से बच्चों की धकापेल
दादा की टोका टाकी
ऊपरी मन से
दादी की कोसा काटी
और इसी बीच

महाराजिन का पूछना
"बीबी जी क्या बनाऊं ?
जब तक यह सब कुछ नहीं
तब तक घर घर नहीं
मत कहना दोबारा
कि मैं


जब १९७४ में रेल हड़ताल हुई तो मैं रेलवे मैन्स यूनियन गाजियाबाद ब्रांच का पदाधिकारी था। रेलवे कर्मचारियों की इस यूनियन की बागडोर फैडरेशन लेबल पर श्री जार्ज फर्नांडीज के हांथों में थी। गाजियाबाद ही नहीं सारे भारत में यंहा तक की मुंबई में भी जहा कभी भी इससे पहले की हडतालों में रेल बंद हुईं हैं, वंहा के प्लेटफार्म पर भी सूनापन पसरा था। गाड़ियाँ जंहा की तंहा खड़ी थीं।
देश में कोंग्रेस का राज था। हर जगह नारे लग रहे थे- "तानाशाही नहीं चलेगी, गुंडागर्दी नहीं चलेगी, हमारी मांगें पूरी करो" आदि-आदि। रेलवे की यह हड़ताल पूरी तरह सफल रही, सिवाय इसके की कुछ स्थानों पर सिर-फिरे पुलिस कर्मियों की ज्यादती रही। हर जिले की जेलें हडताली कर्मचारियों से पात दी गयीं, लेकिन यह सुनने को नहीं मिला कि किसी कर्मचारी का सिर पुलिस की लाठी से फूट गया या कर्मचारियों को दोड़ा-दोड़ा कर पिता गया। मैं चूँकि स्वयं भुक्तयोगी रहा हूँ, इसलिए इसका साक्षी भी हूँ। जेल में जेल अधिकारीयों का व्यवहार अच्छा और सोहार्दपूर्ण था।
लेकिन आज का नजारा दूसरा है, ३६ साल में देश ने बहुत तरक्की की है। पुलिस और नेताओं के दिमाग विकसित हुए हैं, उनकी सोच बदली है। अब वे हडताली कर्मचारियों को आदमियों के झुण्ड में न देख कर पशुओं के झुण्ड में देखते है उन्हें लगता है की साड़ी भेड़ें एक हो गयी हैं और ये बिना लाठी के काबू में नहीं आयेंगी। साथ ही लाठी चलाने वाले और चलवाने वाले अफसर राज्य -सर्कार में अपने नंबर बदवाना चाहतें हैं। अब नंबर तो इसी तरह से बढेंगे न कि वे सरकार कि मर्जी के मुताबिक़ कार्य करें। अपना विवेक और अपनी मानवता घर के भीतर खूंटी पर टांग कर कार्य करें।
दिनांक २२/१/२०१० को आप लगभग सभी चैनेलों पर देख रहे होंगें कि किस प्रकार उत्तर प्रदेश कि राजधानी लखनऊ का डी.एम. एक कर्मचारी को चांटा मार रहा है। और चांटे से पहले चेतावनी देना भी नहीं भूलता कि उसे गुस्सा न दिलाया जाय। अब डी.एम. के एक चांटे ने उस कर्मचारी की सामाजिक इज्जत और उसके स्वाभिमान पर एक प्रश्न चिन्ह लगा दिया। यदि डी.एम.के स्थान पर कोई उसका हमजोली होता तो उसका भी हाथ उठ सकता था, लेकिन यंहा उस कर्मचारी का विवेक काम कर रहा था की प्रत्युतर का परिदाम होगा शरीर की एक भी हड्डी का साबुत न बचना।

प्रश्न चांटे या लाठी चार्ज पर ही समाप्त नहीं होता। यदि सरकार तंत्र ने येनकेन-प्रकारेण इस स्थानीय साधारण से विद्रोह को कुचल भी दिया और विजय प्राप्त कर ली तो क्या समस्या का हल हो गया? मैं समझता हूँ इससे कर्मचारियों के मन में जो विद्रोह का विस्फोट होगा वह लाठी और चांटे से अधिक भयंकर होगा। साधारण स्थिति में भी जंहा दफ्तर का बड़ा बाबु अपनी सीट पर अपना चश्मा रख कर गायब हो जाता है, और लोग इन्तजार में ऐसे बैठे रहते है, जैसे वे किसी चिता के पास बैठकर कपाल खोपड़ी की क्रिया पूर्ण होने का इन्तजार कर रहे हों. चुपचाप बिलकुल शांत लोहे या फट्टे की बेंच पर रह -रहकर पास बदलते हुए । तो इस लाठी -चांटे का बदला कर्मचारी अपनी अनुपस्थिति का समय बढाकर, सही को सही कहने की अपनी सुविधा शुल्क बढाकर सरकार से बदला लेने की कोशिश करेगा। और इसके बाद कर्मचारी किसी भी हड़ताल या विद्रोह जताने से पहले दस बार सोचेंगे। शायद धीरे-धीरे वे किसी भी प्रकार के विदोढ़ से ही विमुख हो जायें। और महसूस करने लगे कि प्रजातंत्र और लोकतंत्र केवल दिखावा है। जंहा व्यक्ति अपना विरोध प्रकट नहीं कर सकता वंहा कैसा लोकतंत्र।

दादा जी (पंडित श्यामलालद्) छोटे कद के, बड़े प्रभावशाली व्यक्ति थे। उन्हें सारा गाँव बापू कहता था। दिल्ली का हाल जानने के लिये बड़े बेताब थे, सो थोड़ी देर बाद ही उन्होंने पूछना शुरू कर दिया। गुड़वाली धर्मशाला, बगीची माधेदास, पीली कोठी, मोर सराय, जाट धर्मशाला आदि जहाँ-जहाँ गाँव के ब्राह्मण, ठाकुर, गडरिये, मैना ठाकुर, उपाध्य रहते थे सभी के बारे में यह जानने की बड़ी उत्कण्ठा थी कि वे सभी इतनी बड़ी मारकाट में जिन्दा बचे या नहीं।
न जाने पिताजी कितनी रात तक उन्हें विस्तार से सब कुछ बताते रहे, मुझे न जाने कब नींद आ गयी । सुबह जब उठा तो सूरज की पहली किरणें हल्की गुलाबी ठंड में लिपटीं सारे आँगन में फ़ैल चुकी थीं और सामने कुए के पास खड़ा पीपल मस्ती में झूम रहा था।
पिताजी के सामने सबसे बड़ी परेशानी थी, मेरी पढाई। दूसरी कक्षा तक मेरी पढाई दिल्ली के उमराव सिंह प्रामरी स्कूल, जो चाँदनी चौक में जग प्रसिद्ध गौरी शंकर मंदिर से सटा हुआ है, हुई थी। और अब मुझे तीसरी कक्षा में दाखिला लेना था।
ये सब हालात और बातें 1947 के जुलाई माह के पहले सप्ताह की हैं। अगस्त की 15 तारीख तय हो चुकी थी, देश की आजादी की। जिस दिन देश के पहले प्रधानमन्त्री श्री जवाहरलाल नेहरू को लालकिले की प्राचीर से झण्डा लहराना था। पिताजी ने तय किया किया कि 15 अगस्त का दिन देश के लिये एक अति महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दिन है, सो वे मुझे और माँ को लालकिले पर होने वाला यह जश्न जरूर दिखायेंगे।
आजादी के इस पहले त्यौहार पर मैं पिताजी के साथ दिल्ली में था। और भीड़ चूंकि लाखों में थी, सो 11 साल की उमर के किसी बच्चे के लिये यह सम्भव नहीं था कि भीड़ के बीच खड़ा होकर वह देश के पहले प्रधानमन्त्री को आजादी का झण्डा फहराते हुए स्वयं के बल पर देख सके। पिताजी ने मुझे आजादी का पहला दिन और पहला जश्न अपने कंधे पर बिठा कर दिखाया, जिसकी तस्वीर आज भी जहन में ज्यों की त्यों है।
आजाद देश के जन्म का आनन्द बहुत देर तक नहीं रह सका। पिताजी ने शाम को लौटकर बताया था कि पहचान के काफी लोग गायब थे। जिनमें कुछ हमारे खानदानी भी थे और खान साहब भी। खान साहब अपनी पठानी वेशभूषा में खूब जमते थे और घर-घर जाकर हींग बेचा करते थे। वे सब या तो भाग गये थे, या मारे गये थे। लेकिन खान साहब इस दुनियाँ में अब नहीं थे। यह खबर पक्की थी। क्योंकि जो लोग उनसे जुड़े थे, उन्होंने उनकी लाश धर्मशाला की दीवार के साथ वीराने में पड़ी देखी थी। जब भी किसी जाने पहचाने आदमी की खबर मिलती तो घर में मातम छा जाता। पिताजी भी बहुत भावुक व्यक्ति थे और उनका यह गुण मेरे भीतर पूरी तरह समाहित है। जब एक व्यक्ति की दुनियाँ से विदा होने की खबर मिलती तो उसके साथ-साथ एक बड़ा इतिहास भी दफन हो जाता।
समय जहाँ तेजी से आगे दौड़ता है, वहीं बीते हुए पर धूल की परत और खुले घावों पर मरहम लगाता चलता है।
पिताजी फिर से मुझे और माँ को गाँव में छोड़कर अपनी नौकरी पर लौट गये।
अक्तूबर तक मैं बिल्कुल खाली और आजाद था, जो दूसरी कक्षा की किताबें मेरे पास थीं। अक्सर उन्हीं को यदा-कदा पढ़ता या फिर गाँव में नये-नये बने दोस्तों के साथ गाँव में खेले जाने वाले खेल जैसे गिल्ली-डण्डा, चंगला मार, नौ गोटी, कबड्डी या फिर कोड़ा जमालशाही खेलता।

हमराही