जय लोक मंगल के सभी मित्रों को मेरा नमन
कहते हैं न कि एक तो गिलोय कडवी दूजे नीम चढ़ी सो अपना भी वही हाल है एक तो व्यस्तता अधिक दुसरे इस
कंप्यूटर कि विधा में हाथ कमजोर ,इसी लिए इतने दिनों के बाद यह मुलाक़ात हो रही है तो चलिए आपकी नाराजगी को दूर करते हैं एक नई रचना से
पडौसी
मैं पडौसी को नहीं
पडौसी के घर को जानता हूँ
भला हो
उसके द्वार पर लगे नामपट्ट का
जिससे चलता है पता
कि वह किस जात का है
जब मैं इस शहर में आया
तो मैंने भी
अपने दरवाजे पर
अपना नहीं ,अपनी जात का बोर्ड लगवाया
बोर्ड इस लिए कि वह
नामपट्ट से बड़ा होता है
और पडौसी को
यह अहसास दिलाना जरूरी था
कि मैं तुझ से कम नहीं
तू मुझे नहीं जानता
तो मैं भी तुझे नहीं
यहाँ आकर पता चला
कि पडौसी का पडौसी को न जानना
यहाँ कि संस्कृति है
इससे एक बड़ा लाभ यह होता है
कि वक्त पड़ने पर पडौसी
आराम से कन्नी काट जाता है
और घर के सबसे पिछले कमरे में
बज रहे रेडियो को धीमा कर
या फिर कर
टी वी को साइलेंट मोड़े पर
पडौसी की अर्थी उठने का इन्तजार करता है
दुनियादारी भी जरूरी है
इस लिए वह
ऑफिस जाते हुए
कुछ मिनट के लिए
मरघट जाना नहीं भूलता
अफ़सोस जता कर
यह बताना नहीं भूलता
की वह आदमी की जात का है
सुना है की यह शहर की कल्चर है
पर न जाने क्यों , मैं
सोचता रहता हूँ
की यहाँ का बाशिंदा
आदमी है या वनचर है
वैसे इस तरह का चलन
नेताओं के लिए बड़ा हितकारी है
क्योंकि उनका
आदमी से अधिक
उसकी जात का जानना बहुत जरूरी है
यही तो वह तुरप का इक्का है
जो हर चुनाव पर भारी है
ढेर लगे ताश के पत्तों पर
जब यह इक्का पड़ता है
तो सारे पत्ते एक तरफ चले जाते हैं
नेता को गद्दी पर बिठाते हैं
फिर ऐसे नेता देश चलाते हैं
न जाने वह दिन कब आयेगा
जब हर घर के दरवाजे पर
जात का नहीं
आदमी का नाम लिखा जाएगा
वह महज एक वोट नहीं
आदमी कह लाएगा
और तब मैं भी
गर्व से कह सकूंगा
कि मैं पडौस के घर को नहीं
पडौसी को जानता हूँ
बी एल गौड़
देश को आजाद हुए 63 बरस बीत गये। जब देश आजाद हुआ तो लोग खुशी से झूम गये कि अब वतन आजाद है, अब इसमें निकलता हुआ सूरज हमारा अपना होगा, इसकी आबोहवा में बसे हुए डर का नामोनिशां नहीं होगा। राजतंत्र और गोरे बादशाहों की जंजीरों से हम छूटे और राज शुरू हुआ, हमारे अपनों का अपनों पर, अपनों के लिए। अर्थार्त राजतंत्र प्रजातंत्र में बदल गया। लेकिन चन्द बरसों में ही लोगों की समझ में आने लगा कि वर्तमान तंत्र में उनके साथ छल हो रहा है। लोकतंत्र और प्रजातंत्र जैसे शब्दों का अर्थ ही बे-मानी हो गया है। यदि तीस लोगों को अपना प्रधान चुनना है तो जिधर 16 के वोट होंगे प्रधान उन्हीं का होगा, चाहे वे 16 के 16 बेईमानी और भ्रष्ट ही क्यों न हों। और इसी संख्या बल के खेल का नाम रख दिया गया डैमोक्रैसी। बड़े-बड़े प्रायोजित विद्वान इस देश की जनता का प्रजातंत्र । डैमोक्रैसी का शाब्दिक अर्थ समझाने लगे गवर्मेंट ऑफ़ दी पीपल, फॉर दी पीपल और बाई दी पीपल। सब कुछ ठीक था, लेकिन इस सब में यह पीपल अर्थार्त पब्लिक कहीं नहीं थी। इसे तो मान लिया गया था - भेड़ों का झुण्ड। जब भी चुनाव आते- बगुले बंगलों से सड़क और गलियां में दिखाई देने लगते और भेड़ों की भीड़ का एक-एक आदमी, आदमी से बदलकर वोट बन जाता। जब भी कभी नेताओं के आवास पर चुनाव सम्बन्धी बैठक होती तो सभी प्रश्नों और उत्तरों में एक ही बात की चर्चा होती कि अमुक स्थान में अपने कितने वोट हैं और यदि नहीं हैं तो शेष आदमियों को कैसे वोट में तब्दील किया जा सकता है।
देश की संसद के लिए और प्रदेशों की विधान सभाओं के लिए जब चुनाव के मेले समाप्त होते तो वहां बनती सरकारें। वे सरकारें जो देश चलाती हैं अर्थार्त जनता को हाँकती हैं। जो नेता कल तक वोट के लिये दरवाजे पर खड़ा था आज उसके द्वार पर तैनात वर्दीधारी गार्ड और लान में घूमते कुत्ते उसी वोटर को अपने चुने हुए प्रतिनिधि की एक झलक से भी रोकने से गुरेज नहीं करते। इस तरह के हालात बीतते-बीतते आ गया नयावर्ष -2011
पिछले बरस अर्थार्त 2010 में हमारे देश में एक बड़ा कार्य हुआ अर्थार्त राष्ट्रमण्डल खेलों का आयोजन देश की राजधानी दिल्ली में हुआ। जिन भ्रष्ट लोगों के हाथों में आयोजन की कमान थी, उनका कलमाड़ी नाम का एक मुखिया था। इस मुखिया के तहत एक समिति बनी, जिसका मुख्य पेशा था - लूट और साथ ही साथ राष्ट्रमण्डल खेलों का आयोजन। खेलों की तैयारियां चलती रहीं और लूटमारों की तिजोरियां भरती रहीं (जनता की खाली होती रहीं)।
फिर खेल खत्म और पैसा हजम वाला दिन आया। खेल खत्म हुए और भ्रष्टाचार को देख-देखकर दुखी हुई जनता को मुर्ख बनाने के लिए और भ्रष्टाचार का पता लगाने के लिए जाँच समितियां बनने लगीं। मीडिया और जनता डर-डर कर शोर मचाने लगे कि खेलों में भ्रष्टाचार हुआ है। फिर जाँच में थोड़ी आँच लगाईं जाने लगी, कुछ गिरफ्तारी आदि होने लगीं। इसी दौरान और भी कई बड़े घोटाले हुए। 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला वह भी एक लाख छियत्तर हजार करोड़ का था। उसी तरह कोई तेलगी घोटाला तो किसी अली का घोटाला इत्यादि। हताश जनता यह मान बैठी कि अब कुछ होने वाला नहीं है और हमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऐसे ही भ्रष्ट तंत्र में जीना पड़ेगा। 63 सालों का घोटालों का इतिहास साक्षी है कि घोटालेबाज चाहे केन्द्र के रहे हों अर्थार्त प्रदेश के, उनका आज तक कुछ भी नहीं हुआ और न भविष्य में कुछ होने वाला है। भले ही जनता की नजर में वे दागदार रहे हों लेकिन यह निश्चित है कि वर्तमान तंत्र के अंतर्गत वे बेदाग छूटेंगे। क्योंकि पिछले 63 बरसों की एक भी नजीर ऐसी नहीं है जिसे सामने रख कर यह कहा जा सके कि हाँ फलाँ घोटाले में फलाँ घोटालेबाज को इतनी सजा हुई थी।
ऐसे ही घुटन भरे नीम अँधेरे में से एक सूरज निकला जिसका नाम है -अन्ना हजारे , यह सूरज निकला महाराष्ट्र की धरती पर। हालांकि सूचना का अधिकार (आर.टी.आइ) का कानून बनते समय- अन्ना हजारे का नाम सुर्ख़ियों में रहा, लेकिन उसे तब तक बालरवि के रूप में ही जाना जाता रहा। लेकिन 5 अप्रैल का यह अन्ना हजारे नाम का सूरज अचानक दिल्ली की दहलीज पर आ चमका। और उसने आते ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक बिगुल बजा दिया। उसके शंख की ध्वनि पूरे देश में पहुंच गई और सारा देश एक गहरी निद्रा से जाग गया।
अन्ना हजारे भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर अनशन पर बैठ गये। देश की जनता को लगा कि गाँधी फिर लौट आये हैं, इस बार विदेशियों से नहीं देशियों से आजादी दिलाने के लिए। उनका अनशन तुड़वाने के लिए सरकार ने बड़े प्रयत्न किये अन्ना को बतलाया गया कि जो लड़ाई आप लड़ने आये हैं वही तो हम भी लड़ रहे हैं और बिल्कुल उसी तर्ज पर लड़ रहे हैं जिस पर पूरे 63 साल से हम से पहले वाले नेता लड़ते रहे हैं। अन्ना को ये सब दलीलें बेहूदी लगीं, वे एक ही बात को लेकर अड़े रहे कि भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए जो भी समिति बनेगी उसके आधे सदस्य जनता के होंगे और आधे सरकार के और इसका अध्यक्ष होगा कोई न्याय में आस्था रखने वाला सेवानिवृत्त न्यायाधीश । न इससे ज्यादा न इससे कम और अन्त में इस नये गाँधी के सामने वर्तमान सरकार को घुटने टेकने पड़े। केवल 83 घंटे में सरकार पूरी तरह हिल गई , सारे देश में एक सैलाब आ गया, हर जुबान पर एक ही नाम था और वह था- अन्ना हजारे अमर रहें, अन्ना हम तुम्हारे साथ हैं, देश का हर नागरिक यही आवाज देने लगा। और अन्ना हजारे की विजय के साथ ही यह 83 घन्टे का युद्ध दिनांक ८.४.२०११ को रात लगभग 11 बजे समाप्त हो गया। अब एक कानून बनेगा और उम्मीद है कि घोटालों के युग की समाप्ति होगी।
अन्ना हजारे जैसे युग पुरुष बड़ी मुद्दत के बाद किसी देश की धरती पर जन्म लेते हैं। शतायु हों श्री अन्ना हजारे यही प्रार्थना है ईश्वर से।
- बी.एल. गौड़
बचा ही नहीं बूँद भर अम्रत पी गए देव बिना विचारे बोल का परिणाम महाभारत हुआ निस्सार शपथ लेते लेते गीता का सार लम्बी उमर नापते अनुभव न कि बरस सीता का दुःख उर्मिला के सम्मुख कुछ भी नहीं एक ही प्रश्न कब हों पीले हाथ चिंता में तात चुनाव देख बगुलों के वेश में निकले कौवे केन्द्रविंदु है सीता अपहरण रामायण का बी एल गौड़
लेकिन ये बल्ले-बल्ले हसनअली वाली बिरादरी के ही आदमियों की होती है। बिरादरी से मेरा मतलब है स्कैमर्स की बिरादरी, चाहे वे कलमाड़ीस हों, चाहे हसनअलीस। हसनअली के केस में तो पढ़ने को यह भी मिला कि अभियोजन पक्ष का वकील कमजोर पड़ गया, इसलिए हसनअली को तुरन्त जमानत मिल गई वर्ना कोई सवाल ही पैदा नहीं होता कि व्हील चेयर पर बैठकर आये हसनअली साहब को न्यायालय में घुसते ही जमानत मिल जाती। कुछ लोगों का तो कहना यह भी है कि आयोजन पक्ष के वकील को हसनअली के आदमियों ने पानी में घोलकर कमजोरी की दवा पिला दी, जिससे वकील साहब कमजोर पड़ गये और कोई दलील ही नहीं दे पाये कि जमानत से पूर्व हसनअली को रिमाण्ड पर लेकर उस अकूत धन के विषय में पता लगाया जा सके। जिसके विषय में उच्चतम न्यायालय केन्द्र सरकार से भी नाराजगी जता चुका है और प्रश्न भी कर चुका है कि हसनअली को अभी तक गिरफ्तार क्यों नहीं किया। वैसे हसनअली वाला यह संगीन मामला ऐसा नहीं कि देश के पिछले दशक में अकेला ही हो। इससे पूर्व में कितने ही संतरी, मंत्री, राजा, राजू, बाबू अर्थात् आई.ए.एस., आई.एफ.एस. और इन्हीं सेवाओं के समकक्ष कस्टम, इंकम टैक्स, सेल्स टैक्स आदि-आदि सेवाओं से जुडे़ हुए, लोग सी.बी.आई. के फंदे में आये पर कुछ दिनों के बाद हाथ में से मछली की तरह फिसल गये। मुकदमें आज भी बदस्तूर चल रहे हैं और वे लोग भी चल रहे हैं और उनसे सम्बंधित उनके अपनों की बल्ले-बल्ले बदस्तूर जारी है।
असल में भ्रष्टाचार अब केवल भ्रष्टाचार मात्र नहीं रह गया, बल्कि एक जीवाणु का रूप लेकर कुछ व्यक्तियों के खून में घुल चुका है और साथ ही प्राण-घातक बीमारी का रूप भी धारण कर चुका है। अब इससे कौन-कौन बचा है, छाँटना मुश्किल ही नहीं असम्भव सा हो गया है। इसका कारण बड़ा स्पष्ट है कि हम भ्रष्टाचार में डूबे या आरोपित व्यक्तियों के खिलाफ आज तक एक भी नशीर पेश नहीं कर पाये, जिसके मद्देनशर देश की जनता को यह बता सकें कि देखो भई वह मंत्री या बाबू जिसके यहां इतने टन सोना और इतने करोड़ बेहिसाब नकदी मिली थी, हमने उसकी यह गति की है। आप भी देख लें और आप या आपके भाईबंद शासन में किसी भी संवेदनशील पद पर विराजमान है तो जरा ईमानदारी से काम करें वर्ना आपका भी यही हस्र होगा जो इन श्रीमान का हुआ है।
1947 में देश आजाद हुआ। इस देश में 63 साल से स्वतंत्रता दिवस और बाद में गणतंत्र बनने के बाद गणतंत्र दिवस लगातार मनाया जा रहा है। और एक लम्बे समय से देश को खोखला करने में भ्रष्टाचारी लोग भी जी-जान से लगे हुए हैं।
ऐसा नहीं कि वे पकड़े नहीं जाते, पकड़े भी जाते हैं और 20 से 30 साल तक मुकदमा भी झेलते हैं और फिर बाइज्जत बरी होकर आम नागरिक की तरह अपना शेष जीवन मौज के साथ बिताते हैं।
इस सबका इतना घातक परिणाम जनमानस पर हुआ है कि उसके दिमाग से ‘डर’ नाम का शब्द गायब हो गया है, उसकी धारणा यहाँ तक बन गई है कि कानून उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। कभी-कभी न्याय व्यवस्था भी विवश हो जाती है, जैसे बोफोर्स तोप घोटाले में उसे विवश होकर यह कहना पड़ा कि इस केस को हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दिया जाये।
64-65 करोड़ के दलाली के इस केस पर न्यायालय के 22 साल और देश के लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च हो गये, लेकिन पहाड़ खोदने के बाद मरी हुई चुहिया भी नहीं मिली। और सरकार व न्यायालय ने इस केस को बन्द करके एक अच्छा काम किया। इस शब्द ‘बोफोर्स’ को पढ़ते-पढ़ते आम जन बहुत ऊब गया था, बिल्कुल उसी प्रकार जिस प्रकार सन् 1984 के सिख विरोधी दंगों की यदा-कदा छपी हुई बात को पढ़कर पाठक अख़बार के उस पृष्ठ को पलटते हुए अगले पृष्ठ पर पहुँच जाता है।
लेकिन यह सब अब आगे चलने वाला नहीं है। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने और वर्तमान सरकार ने सरेआम यह ऐलान कर दिया है कि अपराधी चाहे जितने भी रुतबे वाला हो, किसी भी पद पर हो अब बख्शा नहीं जायेगा और इसी के मद्देनशर दिन-प्रतिदिन कलमाड़ी से जुड़े 2जी वाले मामले में जड़ों को बहुत गहराई तक खोदा जा रहा है जहाँ से दबे हुए सत्य को बाहर लाया जायेगा।
निःसंदेह प्रधानमंत्री की घोषणा और ईमानदारी से उठाया हुआ यह कदम सराहनीय है और यह फैसला उम्मीद जगाता है कि अब भविष्य में हसन अली जैसों की नहीं बल्कि आम आदमी की बल्ले-बल्ले होगी।
बी.एल. गौड़
इससे पहले कि मैं यह कविता लिखूं , मैं वीना,वन्दना ,अन्ना ,डोर्थी ,सुशिल बाल्किवाल,मृदुला प्रधान और पटाली के प्रित अपना आभार प्रगट करना चाहूंगा जिनोंहने मेरी कविता "हंसुली जैसा चाँद "पर अपनी टिप्णियाँ भेज कर
मेरा उत्साहवर्धन किया करीब १२ दिन विदेश में रहकर लौटा हूँ इस लिए आप सभी को धनंयवाद देने में भी देरी हुई है
अब आज लिखी कविता देखें :-
सुन मेरे पारद सरीखे मन
न जाने कब मुझे
पगडंडियों ने
ला धकेला राजपथ पर
और तब से अनवरत
मैं चल रहा हूँ अनमना सा
तप्त डाबर कि सड़क पर
अंतर नहीं कोई यहाँ
अंधेरों में उजालों में
यहाँ हर शाम रूमानी
टकरते जाम प्यालों में
कान फोडू बेसुरा संगीत
कोई सुर न कोई ताल
न कोई है अदब कायदा
बस, डगमगाती बेतुकी सी चाल
इससे पहले
कि ये मंज़र मुझे डस ले
ए मेरे छलनी हुए मन लौट चल
तू फिर उनींह pagdandion पर
यहाँ हर आदमी
जो दिखता है नहीं होता
जो होता है नहीं दिखता
और प्यार कि पाकर छुवन वह
मुंह छिपाकर खूब रोता
जब कभी वह सभ्य दिखता है
तो लगता देवता का रूप
कभी वह छाँव ममता कि
कभी वह क्रूरता कि धूप
न जाने क्यों हमें लगता
कि हम यहाँ आकर बने है
टांड पर ताले लगे संदूक
इससे पहले
कि ये ताले खुलें
और अंतस में बसे
सीधे सरल से भाव हों कलुषित
सुन मेरे पारद सरीखे मन
लोट चल तू फिर उसी परिवेश में
तीर नदिया के जहां पर
नृत्य करते मोर
स्वर्ण की चादर लपेटे
धीरे ,बहुत धीरे सरकती भोर
और सारस ताल में डुबकी लगाकर
आ किनारे फडफडाते पर
बी एल गौड़
