हर दिवस के अंत पर
सज संवरकर
आ खड़ी होती है सम्मुख शाम
पूछने को प्रशन
क्या किया दिनभर
क्या हुए पूरे अधूरे काम ?
सोचता भर हूँ
कह नहीं पाता
क्योंकि मेरा उत्तर भी
अधूरा उसके प्रश्न सा
मुझी से पूछता है प्रश्न
क्या कभी पूरे हुए हैं
इस जगत में आदमी के काम ?
तुम्हारे प्रश्न का उत्तर
नहीं है पास मेरे
बल्कि उलटा प्रश्न है
बस तनिक इतना बता दो
क्या कभी
उसको लिवाकर ला सकोगी
नाम जिसके आज तक लिखता रहा मैं
प्रीत के पैगाम
ए सूर्य ! तुम तुमसे प्रार्थना है
खींच करके रज्जुओं को
अश्व अपने थाम लो
न जाओ आज अस्ताचल
तनिक विश्राम लो
क्यों लग रहा ऐसा मुझे
कि आज वह आने को है
चाहता हूँ
मैं तुम्हारी इस बिखरती लालिमा से
एक चुटकी भर चुरा लूं
और भर दूं मांग उसकी
नाम जिसके कर चुका मैं
उम्र कि हर शाम
बी एल गौड़ .
एक नई रचना
क्या सही है
________
जलधि की व्याकुल गरजना
या नदी का
चिर मिलन को यों मचलना
क्या सही है
स्वप्न के चलचित्र मिटना
या किसी के
हाथ के कंगन खनकना
क्या सही है
बंद दरवाजे पे मेरे
अर्गला का
एक अरसे से न बजना
क्या सही है
उम्र का तेजी से बढना
कुछ ठहर कर
तीव्र गति से यों सरकना
क्या सही है
यह जगत मित्थ्या , न कहना
कुछ भी कहो
मगर यह सोच कर कहना
क्या सही है
रुकमनी के साथ रहना
इक विवशता
ध्यान में राधा के रमना
क्या सही है
गिरते निर्झर का गीत लिखूं
या लिखूं नगर की चहलपहल
या सूर्योदय के स्वागत में
मैं लिखूं भोर की कुछ हलचल
जब बिखरा ईंगुर धरती पर
आया मंदिर से शंखनाद
कानों से आकर टकराया
वह परम सत्य वह चिर निनाद
इस मन की दशा न रहती थिर
यह तो पारद सा है चंचल
मैं कह्ता पीर बड़ी मेरी
है दुखी बहुत अंतस रहता
पर गर्जन कर सारंग कह्ता, मैं
तुमसे कहीं अधिक बहता
बस अब न रहा अंतर कोई
अब तुम भी मुझ से हुए विरल
देखता हूँ जब क्षितिज पर
सूर्य को प्रस्थान करता
ठहर कर मैं एक पल को
फिर स्वयं से प्रशन करता
जोहते कब तक रहोगे
बाट तुम उस हमसफ़र की
जो न जाने जा बसा अब
कौन सी बस्ती नगर की
भीड़ रिश्तों की बहुत पर
कौन किसकी धीर धरता
पूछता अब नित्य मन से
राह अपनी को बदल दूं
छोड़ कर व्यापार नित का
तीर गंगा के शरण लूं
नीर का संगीत जिसका
पीर का उपचार करता
सोचता हूँ फिर ठहरकर
ए नियति ले चल कहीं पर
पर तनिक यह देख लेना
मैं रुकूं ऐसी जगह पर
प्यास से व्याकुल जहां पर
हो न कोई म्रग भटकता
कौन है नेपथ्य में
जो दे रहा मुझको निमंत्रण
कौन है
जो रात के अंतिम पहर में
पास आकर मुस्कराकर
है बताता राह आगे की
कौन करता रोज कोशिश
नींद कच्ची से जगाने की
जब कभी एकांत में
कुछ सोचता हूँ
तब न जाने कब कहाँ से
आ खड़े होते हैं सम्मुख
बीते हुए रीते हुए कुछ क्षण
कैसे बताऊँ मैं उसे
की स्वप्न बेहतर हैं
हकीकत से
पर नहीं है जीत
उनके भाग्य में
भोतिक जगत से
तू कहीं पर है
इसी एहसास ने
मुझको बनाया मर्ग सरीखा
ओर तब से
खोजने को ताल जल के
तप्त रेगिस्तान में
मैं कर रहा विचरण
जानता हूँ
स्वांस तो गिनकर मिले हैं
हैं अभी कुछ शेष
क्योंकि हम धीरे चले हैं
कर रहा अब तक प्रतीक्षा
मैं किसी के आगमन की
कौन जाने
वह कभी आये न आये
सुन सके जो बात मन की
बस स्वांस ही आधार है
चलता रहे
जब तक चले
दीप में जलती हुई बाती
जलती रहे
जब तक जले
कौन कर पाया कभी
आती जाती स्वांस पर
अपना नियंत्रण
मेरे ब्लॉग के मित्रो ! नमस्कार
मुझे नहीं मालुम की आप सब लोग मेरे विषय में क्या सोचते होंगे क़ि में एक दिन ब्लॉग पर कुछ लिखता हूँ और फिर एक लम्बे समय के लिए गायब हो जाता हूँ
आदमी एक व्यस्ताएं अनेक , क्षमा चाहता हूँ , वायदा तो नहीं लेकिन कोशिश रहेगी आप सबसे जुड़े रहने की अब बात करते हैं आज की एक कविता की इसे आप www .gaursonstimes.com के साहित्यिक प्रष्ट पर भी देख सकते हैं
मौन
ओ मेरे मनमीत, तुम
कब तक रहोगे मौन ? 
यात्रा अंतिम चरण की ओर
धीरे -धीरे
मंद होता जा रहा
ये जिंदगी का शोर
आज भी तुम
शून्य में द्रष्टि जमाये
ढूँढ़ते रहते जिसे, वह कौन ?
बंद होठों पर धरे तुम तर्जनी को
कर रहे मुझको इशारा
चुप रहूँ , मैं कुछ न बोलूं
हर शब्द को सौ बार तोलूं
पर तनिक यह तो बताओ
बज उठेगी अर्गला जब द्वार पर
कौन ? उत्तर में कहेगा कौन ?
चाह इतनी बलवती क्यों
मैं अभी जीवित रहूँ
और मेरी खोज जो अब तक अधूरी
मैं उसे पूरी करूं
जानता हूँ
चाहतें तो पत्तियां हैं पेड़ की
सूखकर गिरतीं धरा पर
कोपलों के रूप में फिर लौट आतीं हैं
पर , बावरी सी सिर पताक्तीं
ये हवाएं कौन सी
जो लौटतीं हर बार जाकर
थपथपाकर द्वार मेरा
रात आधी को जगातीं हैं
खोलता जब द्वार अपना
तब सिवा मैं शून्य के कुछ भी न पाटा
फिर कोई आवाज
बनकर गूँज करती प्रश्न
बस , तनिक इतना बता दो
उम्र बीती राह जिसकी ताकते
वह भाग्यशाली कौन ?
बी . एल . गौड़