एक दिन यूँ ही
बेटी की किताब खोली
तो बीच पन्नों के मिली
चिपकी हुई एक तितली
न जाने क्यों
उस दिन
मन बहुत उदास रहा
बेटी समझ गई
मेरी उदासी का कारण
"बुरी बात है
किसी को मारकर
यों कैद रखना "
यादों की बात और है
हालांकि वे भी
मरी हुई तितलियों की तरह
चिपकी रहतीं हैं सदां
मन की किताब के पन्नों के बीच
पर एक अंतर है :-
लाख जतन करने पर भी
नहीं जीवित हो पातीं
किताब के पन्नों के बीच
चिपकी हुईं तितलियाँ
जबकि यादें
बिना किसी प्रयास के
मरकर भी जीवित रहतीं हैं
उडती हुई तितलिओं की तरह
सीता का दुःख
उर्मिला के सम्मुख
कुछ भी नहीं
छू लेगी जिसे
संवेदनहीनता
बनेगा काठ
उमर बीती
पर नहीं निकला
बात का डंक
बिना उसके
नदी के उस पार
कुछ भी नहीं
आंधी से डरे
बरगद से पेड़
कोपलें नहीं
मैंने अभी
कल परसों में
कुछ नए दोस्त बनाए हैं
गुलाबों को हटाकर
कुछ केक्टस लगाए हैं
पाई है जब से
हमदर्दी नागफनी की
भुला दी रात की रानी
महक चम्पा -चमेली -गैंदा गुलाब की
नज़र से बची रहे
फलती -फूलती नागफनी
इसी लिए आस -पास
केक्टस स्वरुप
कुछ पहरुए बिठाए हैं
मुझे मालूम है
नहीं चलेगा काम
केवल नागफनी और केक्टस से
काश !जी पाते हम
रिश्तों की खुशबुओं के बिना
जी पाते हम
बिना यादों की चुभन के
हो सकता है किसी दिन
कुछ भूले भटके लोग
मुझ से मिलने आयें
या फिर कुछ बच्चे
दादा -दादी की चाहत लिए
मेरे द्वार आयें
इसी लिए मैंने
घर के बाहर
झर्बेरिओं के कुछ पौधे लगाए हैं
झुर्रियों में इतहास समेटे
गंभीर चेहरे
करते हैं बयां हकीकत
चिकने सपाट चेहरों से
तुम्हरे हमारे चेहरों का अंतर
परिणाम है आदान प्रदान का
हमारी ओर से आदान हुआ
पर तुमाहरी ओर से प्रदान नहीं हुआ
जिस तरह
गाँव से शहर को
पलायन तो हुआ
पर पुनरागमन नहीं हुआ
मांगती रह गई हिसाब
श्यामल सांझ उजले सवेरों से
लैब से खिलने लगे
बे मौसम फूल
हंसने लगे लोग बेमतलब
तभी से बन गया है मन
छोड़ यह परिवेश कहीं जाने का
देख कर दुर्दशा इन्सानित की
इंसानों के बीच
जहां दूर तलक फैली कीच ही कीच
कोई कमल नहीं
पूछते हैं प्रशन उजड़े गाँव
चमकीले सहारों से
कहते हैं
कि इतिहास स्वयं को दोहराता है
पर मेरा मानना है
कि यह एक मिथ है
यदि यह सच होता
तो कभी तो आती आवाज़
अर्गला बजने की
लाख कोशिशें कीं
कि लौटे वह प्यास
है जो किसी रेगिस्तान में खोई
और बची कुची
जगतार ने मेरे अंतस में बोई
जन्मे हैं जिससे स्वर्ण मृग
जो मारते हैं कुलांचें
रेतीले टीलों के आर -पार
में भी बहुत दौड़ा हूँ उनके पीछे
तलाश में जलाशय की
यदि सच -मुच
अतीत के लौटने की प्रथा होती
तो आज पुनः लबालब होते
मेरे असमय सूखे ताल
और तैरती होतीं लहरों पर
नाव कागज़ की
लम्बी यात्राएं
निरंतर भटकन
और चिंतन मनन के बाद
नगर के बाहर
बस्ती के बीचों -बीच
पीपल के नीचे
खुले मंच पर सजे
शिव लिंग के पास
किसी से बतियाती मिली , जिंदगी
आवाज़ में खनक थी
चेहरे पर गुलाब थे
आंखों में अंजन के साथ -साथ
बहुत सारे ख्वाब थे
मेरी आंखों में प्रश्न्चिनंह देख
उसने पूछा :-
क्या तुम अब भी
यह ज़र्ज़र तन लिए
आंखों में लिए तलाश
मुझे ढूंढ रहे हो ?
मुझे हाँ में सर हिलाते देख
उसने अपनी हँसी बटोरी
और एक कृत्रिम मुस्कान के साथ बोली :-
मुझे दुःख है
कि हमारा -तुम्हारा मिलन
शाश्वत न रह सका
कारण :
तुमेन्ह बुलाते रहे सदैव
जगमगाते राजपथ
और मुझे बुलाती रहीं
बस्ती की पगडंडियाँ
जहाँ बिजली के खम्बे नहीं थे
पर सबके अंतस में
रौशनी के दिए थे
जिन से रोशन थे बस्ती के सभी द्वार
जहाँ आए दिन
किसी न किसी चौखट पर
सजते थे सतिये और वंदनवार
इस सबके अतिरिक्त
यहाँ की हवा में थी
एक आत्मीयता
इसी लिए
तुमसे बिछुड़ने के बाद
यहीं आकर बस गई
तुम्हारी प्रियतमा
तुम्हारी जिंदगी
जाने ऐसा क्यों लगता है
सूरज अब धीरे चलता है
संध्या के पंजों से घायल
कुछ कुछ लंगडा कर चलता है
कनक रंग से रंगी चूनरी
अपने हाथ उढ़ा धरती को
फिर धीरे से गोता खाकर
चल देता अनजान नगर को
हम ही जानें जाने कैसे
तिल तिल करके तम गलता है
गई रात तक हम गिनते हैं
दिन के छूटे काम अधूरे
सपनों में भी ताना बुनते
कल सब कैसे होंगे पूरे
हम चिंता में यह मस्ती में
यही आचरण तो खलता है
टूटे फूटे स्वप्नों के संग
तंद्रा - निद्रा के बंधन में
ओढ़ चदरिया सोते जगते
लेकर कई प्रशन उलझन में
इसकी फिर से वही कहानी
राह पुरानी पर चलता है